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100 रु. ज्यादा मजदूरी के लिए गुजरात गए, 20 मौत:एक ही परिवार के 6 लोग खत्म, मुआवजा लेने वाला भी कोई नहीं बचा

दो साल पहले मेरे चाचा ससुर की मौत हो गई थी। पीछे 6 लोगों का परिवार छोड़ गए थे। चाची ने बेटे की शादी की, जिसके बाद परिवार पर 40 हजार रुपए का कर्ज हो गया था। मजदूरी करके उसी को चुकाने गुजरात गए थे। सभी 6 लोगों की मौत हो गई है। ये कहना है कृष्णा बाई का। कृष्णा बाई, केसर बाई के भतीजे की पत्नी हैं। गुजरात के बनासकांठा में मंगलवार को हुए पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में एमपी के जिन 20 मजदूरों की मौत हुई है, उनमें देवास जिले के संदलपुर गांव की केसर बाई का पूरा परिवार भी था। गांव के लोगों का कहना है कि सरकार अब मुआवजा देने की बात कर रही है लेकिन परिवार में कोई मुआवजा लेने वाला भी नहीं बचा। देवास के 10 और हरदा के 8 लोगों की मौत, 2 की पहचान बाकी
गुजरात की पटाखा फैक्ट्री में जिन 20 मजदूरों की मौत हुई है, वो एमपी के देवास जिले और हरदा जिले के हैं। दैनिक भास्कर की टीम दोनों जिलों में उनके गांव पहुंची। लोगों और परिजन से जानने की कोशिश की कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी, जिसने इन परिवारों को न सिर्फ गुजरात पलायन के लिए मजबूर किया बल्कि इतने खतरनाक काम में भी धकेल दिया। भोपाल से करीब 135 किमी दूर देवास जिले का संदलपुर गांव है। गांव के मुख्य मार्ग पर कुछ ही दुकानें खुली नजर आईं। जिससे भी पूछा कि गुजरात में जिन मजदूरों की मौत हुई है, उनके घर कहां हैं? गांव के अंदर बसी एक गरीब बस्ती की तरफ इशारा करते हुए बता दिया। एक घर से महिलाओं के रोने की आवाज आ रही थी। सामने कुछ लोग गली में बैठे नजर आए। हम उनके पास पहुंचे और बात की। संदलपुर (देवास): पहली बार काम के लिए गया था परिवार, शव आए
गांव के प्यारेलाल नायक कहते हैं कि 6 लोगों का जो पूरा परिवार खत्म हुआ है, वो मेरे चाचा का परिवार था। मेरे परिवार की मौतों के लिए पूरी तरह से गुजरात सरकार जिम्मेदार है, जिसने ऐसी भयानक फैक्ट्री चलने दी। इतनी खतरनाक जगह बच्चों को भी रखा गया था। बिना परमिशन के फैक्ट्री चल रही थी। हम गरीब हैं। थोड़े पैसों के लिए मेहनत मजदूरी कर लेते हैं। क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा। हरदा पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट से बच गए थे, पर गुजरात में नहीं बचे
गुजरात पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में देवास जिले के संदलपुर गांव के 2 परिवारों के कुल 9 लोगों की मौत हुई है। गांव से 10 लोग गुजरात गए थे। एक परिवार वो था, जिसके सभी 6 सदस्यों की मौत हो गई है। एक अन्य परिवार वो है, जिसमें पति राकेश, पत्नी डॉली और बेटी किरण की मौत हो गई है। तीन साल की बच्ची नैना ही बची है। राकेश के बड़े भाई संतोष कहते हैं- पिछले साल हरदा में पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट हुआ था। उसके एक दिन पहले मेरा भाई वहां से छुट्टी लेकर घर आ गया था। उसे बुखार था। अगले दिन जानकारी लगी कि हरदा पटाखा फैक्ट्री में भयानक ब्लास्ट हुआ है। तबीयत खराब होने के चलते घर आ चुके भाई की जान बाल-बाल बच गई थी, लेकिन इस बार किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। वो अपने परिवार समेत हम सबसे दूर चला गया। मेरे एक कड़े फैसले के चलते मेरी पत्नी और बच्चों की जान बच गई। मुझे भी चलने को कहा था, पति ने मना कर दिया
संतोष से बातचीत के दौरान ही उनकी पत्नी आशा नायक बोलीं- मेरे पति को मुंह का कैंसर है। हम छिंदवाड़ा में मजदूरी करते हैं। प्रेशर कुकर बनाने का काम करते हैं। जब मेरे देवर राकेश परिवार के तमाम लोगों के साथ गुजरात जा रहे थे, उन्होंने मुझे फोन लगाया था। उन्होंने मुझसे उनके साथ गुजरात चलने के लिए कहा था। उनका कहना था कि गुजरात में मुझे अच्छा पैसा मिलेगा। महीने का 30 से 40 हजार रुपए कमा लूंगी। उससे पति के कैंसर का ठीक से इलाज हो पाएगा। मैं बच्चों के साथ जाने के लिए तैयार थी, लेकिन मेरे पति ने मुझे नहीं जाने दिया। उनका कहना था कि मैं बीमारी से मर जाऊंगा, लेकिन तुम लोगों को नहीं जाने दूंगा। हंडिया की ठेकेदार लक्ष्मी गुजरात लेकर गई थी
राकेश की मां ने कहा- पिछले साल मेरे बेटे ने कर्जा लेकर मेरा ऑपरेशन कराया था। कुछ ही दिन पहले पिताजी को लकवा मार गया था और उसके बड़े भाई को कैंसर है। इन्हीं सब मजबूरियों के चलते उसे गुजरात जाना पड़ा। राकेश हंडिया गांव से ठेकेदार लक्ष्मी के संपर्क में आया था। दरअसल, राकेश की शादी हंडिया गांव की डॉली से हुई थी। पिछले एक साल से वो पत्नी के साथ ज्यादातर वहीं ससुराल में ही रहता था। कुछ दिन पहले वो इंदौर के पास हाटपिपल्या में चल रही पटाखा फैक्ट्री में काम करने गया था। इसके बाद ठेकेदार लक्ष्मी ने उसे ज्यादा पैसों का लालच दिया और गुजरात ले गई। 8 दिन पहले वो लोग वहीं से गुजरात चले गए थे। हंडिया (हरदा): चार परिवार, 8 की मौत; दो घरों पर ताला लगा
संदलपुर के बाद दैनिक भास्कर की टीम वहां से 9 किमी दूर हरदा जिले में नर्मदा नदी किनारे हंडिया गांव पहुंची। हंडिया के 8 लोगों की ब्लास्ट में मौत हुई है। हंडिया पुलिस थाने के सामने वाले मोहल्ले में ही इन 8 लोगों के 4 घर हैं। हादसे के बाद से ही मोहल्ले में मातम पसरा है। घरों से लगातार चीखने-चिल्लाने और रोने की आवाजें आ रही हैं। 4 में से 2 घरों में ताला बंद है। दो घरों में मृतकों के परिजन मौजूद हैं। ग्रामीण राजेश नायक ने कहा- हादसे के शिकार हुए लोगों में से आधे लोग ऐसे हैं, जो पहली बार पटाखा फैक्ट्री में काम करने गए थे। करीब आधे लोग ऐसे थे, जिन्होंने पहले भी एमपी में ही पटाखा फैक्ट्री में काम किया था। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने उस हरदा फैक्ट्री में भी काम किया था, जहां पिछले साथ बड़ा ब्लास्ट हुआ था। इन्हीं लोगों में से एक मृतक गुड्डी नायक है। कुछ लोग इसलिए बच गए थे, क्योंकि इन्होंने हादसे से 2-4 दिन पहले छुट्टी ले ली थी। मैं उस दिन यहां नहीं थी, वरना बेटी को नहीं जाने देती
कंकू बाई ने कहा- मेरी बेटी बबिता अपने दो बेटों धनराज (18 साल) और संजय (12 साल) को लेकर अमावस्या के दिन गुजरात पटाखा फैक्ट्री में काम करने गई थी। मैं उस दिन पावागढ़ नहाने के लिए गई थी। अगर मैं होती तो उसको कभी नहीं जाने देती। उसने और उसके बच्चों ने पहले ये काम कभी नहीं किया था। मैंने अपनी बेटी को रानी की तरह पाला था। उसे कभी मजदूरी का काम नहीं करने दिया। वो कभी घर से बाहर भी नहीं निकलती थी। लक्ष्मी ठेकेदार उसको बहकाकर ले गई। पहले वो हाटपिपल्या की फैक्ट्री में काम करने गए थे। उसके बाद वहीं से गुजरात चले गए। जब वो घर से गई, तब दामाद भी घर पर नहीं थे। वो अपनी मां का इलाज कराने बाहर गए हुए थे। 100 रुपए ज्यादा मजदूरी का भरोसा और एडवांस भी दिया
हंडिया गांव में सभी मृतकों के परिवार की मुखिया कीतम बाई के कहा- हम नायक समुदाय से आते हैं। ज्यादातर लोग प्रेशर कुकर बनाने और मजदूरी का काम करते हैं। कुछ लोग पटाखा फैक्ट्री में काम करके भी अपनी रोजी- रोटी चलाते हैं। हरदा में फैक्ट्री ब्लास्ट होने के बाद यहां की सभी पटाखा फैक्ट्री बंद हो गई थीं। अभी हाटपिपल्या में एक फैक्ट्री चल रही है। इस गांव से जितने भी लोगों की मौत हुई है, सब मेरे ही परिवार के हैं। मृतकों में मेरे बेटे, बहुएं और पोते शामिल हैं। अब सिर्फ मेरे दो बेटे बचे हैं। मध्यप्रदेश में एक हजार पटाखे बनाने का 250 से 300 रुपए मिलता है। इन सभी लोगों को एक हजार पटाखे बनाने के 400 रुपए देने का लालच दिया गया था। फैक्ट्री में बच्चे भी काम करते थे। वहां उनको डब्बी भरने यानी पटाखों की पैकिंग करने का काम मिलता था। इसके लिए उन्हें 250 से 300 रुपए दिए जाते थे। रहने-खाने की व्यवस्था खुद करनी होती थी। सभी लोग घर से अनाज लेकर गए थे। पटाखा फैक्ट्री में काम पर जाने का यह पहला मामला है
खातेगांव विधायक आशीष शर्मा ने कहा- मैं यहां पीड़ित परिवार से मिलने आया हूं। हमारी सरकार ने मृतकों के साथ सभी लोगों को वापस लाने की व्यवस्था की है। हरदा की घटना के बाद हमारी सरकार ने सबक लिया है। हम अवैध पटाखा फैक्ट्रियों पर निगरानी रख रहे हैं। लोगों को पलायन क्यों करना पड़ रहा है? इस सवाल पर आशीष शर्मा कहते हैं- हमारा क्षेत्र कृषि आधारित क्षेत्र है। किसानों के माध्यम से यहां लोगों को खेती आधारित अच्छी मजदूरी मिल जाती है। इसके अलावा और भी लघु उद्योग चल रहे हैं, जिसमें लोग काम करते ही है। जहां तक औद्योगीकरण की बात है, यहीं नेमावर के पास तलाई में कुछ उद्योगों की सहमति हमें मिली है। संदलपुर के दो परिवारों के 9 लोगों के अलावा हादसे में खातेगांव के पंकज ठेकेदार (40), भाभर के मेहुल (20) की मौत भी हुई है। वहीं, हंडिया के कुल 8 लोगों ने हादसे में जान गंवाई है। हंडिया के मृतकों के नाम ये दो लापता हैं ये 4 हुए घायल —————————————— गुजरात ब्लास्ट मामले से जुड़ी ये खबरें भी पढे़ं… मां ने रोका, फिर भी पटाखा बनाने गया, मिली मौत एक साल पहले हरदा पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में जिंदा बचे शख्स राकेश की गुजरात पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में मौत हो गई। हरदा ब्लास्ट के बाद मां शांताबाई इतनी डरी हुई थी कि राकेश को गुजरात जाने से खूब रोका, लेकिन वह नहीं माना। चार दिन बाद राकेश, उसकी पत्नी डॉली और बेटी किरण की मौत की खबर आई। पढ़ें पूरी खबर… बेटे की तेरहवीं करनी थी, रुपए कमाने गए गुजरात: मां बोली-सब खत्म हो गया हरदा के हंडिया की गीताबाई का पूरा परिवार गुजरात फैक्ट्री ब्लास्ट में खत्म हो गया। दैनिक भास्कर ने गीता से बात की तो बोलीं- होली पर बेटे सत्यनारायण का निधन हो गया था। उसकी तेरहवीं के लिए रुपए नहीं थे। पोते समेत परिवार के 11 लोग काम करने गुजरात गए थे। पढ़ें पूरी खबर…

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