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Lord Shiva: भगवान शिव ने क्यों किया था विषपान?, जानें सावन मास से जुड़ी कथाएं

Sawan 2025 : श्रावण मास यानी सावन का महीना, भगवान शिव को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। इस महीने से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ और रहस्य हैं, जो इस मास को बहुत ही खास बना देते हैं। आइए जानते हैं इस खबर को विस्तार से…

सावन में मां पार्वती ने शिव को पाया

पौराणिक कथा के अनुसार, पर्वतराज हिमालय की बेटी मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए श्रावण मास में कठिन तपस्या की। उन्होंने व्रत रखा, उपवास किया और तप किया। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसीलिए आज भी श्रावण मास में लड़कियां और महिलाएँ अच्छे पति की कामना के लिए व्रत रखती हैं।

सावन में शिव अपनी ससुराल आते हैं

एक और मान्यता के अनुसार, जब शिव और पार्वती का विवाह हुआ, तब भगवान शिव अपनी पत्नी के साथ पहली बार श्रावण मास में उनकी ससुराल (हिमालय के घर) आए थे। उस समय उनका स्वागत अर्घ्य और जल से अभिषेक करके किया गया। कहा जाता है कि हर साल सावन में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं, और इसी खुशी में लोग इस महीने में उनका जल से अभिषेक करते हैं।

समुद्र मंथन और विषपान

पौराणिक कथाओं में यह भी बताया गया है कि समुद्र मंथन श्रावण मास में ही हुआ था। जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले उसमें से बहुत ही जहरीला विष (कालकूट) निकला। उस विष से पूरी सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे पी लिया। उस विष से उनका गला नीला हो गया, और वे नीलकंठ कहलाए। विष के असर को कम करने के लिए सभी देवी-देवता, यक्ष, दैत्य, नाग आदि ने भगवान शिव पर गंगा जल चढ़ाना शुरू किया। तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई और श्रावण में इसका विशेष महत्व माना जाता है।

ऋषि मार्कंडेय की तपस्या

श्रावण मास से जुड़ी एक और कथा ऋषि मार्कंडेय की है। मार्कंडेय ऋषि बचपन से ही जानते थे कि उनकी उम्र बहुत कम है। अपने पिता की आज्ञा से उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दीर्घायु का वरदान दिया। कहा जाता है कि उनकी यह तपस्या भी श्रावण मास में पूरी हुई थी।

श्रावण मास में छिपा गूढ़ रहस्य

श्रावण मास केवल कथाओं और पूजा-पाठ का महीना ही नहीं है, बल्कि इसमें गहरी आध्यात्मिक बातें भी छुपी हैं।
यह हिन्दू पंचांग का पांचवाँ महीना होता है।
सनातन धर्म में पाँच और तीन का बहुत महत्व है।
जैसे —

  • भगवान शिव के तीन नेत्र (त्रिनेत्र)।
  • उनका त्रिशूल।
  • उनके तीन रूपों का त्रिपुर संहार।
  • त्रिगुण (सत, रज, तम)।
  • त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)।

इसी तरह पाँच का भी महत्व है

  • पंचतत्व (मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)।
  • पंचकोश।
  • शिव के पंचमुख।
  • पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय)।

श्रावण मास का पंचांग में पाँचवाँ होना भी इस रहस्य से जुड़ा हुआ माना जाता है।

Hind Lehar

Writer & Blogger

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