Ethiopia Volcano : इंडोनेशिया में हाल ही में सक्रिय हुए ज्वालामुखी से निकली राख और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) गैस का विशाल गुबार अब धीरे-धीरे अरब सागर पार करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहा है। बता दें कि भारतीय मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह बादल उत्तर और मध्य भारत के ऊपर मध्यम वायुमंडलीय स्तर पर पहुंच चुका है। हालांकि, राहत की बात यह है कि इसका सीधा प्रभाव जमीन पर रहने वाले लोगों पर फिलहाल सीमित रहने वाला है।
किन क्षेत्रों पर हो सकता है असर?
जानकारों के अनुसार, राख का यह बादल सामान्य सतह स्तर से काफी ऊपर है, ऐसे में दिल्ली, पंजाब, राजस्थान या हरियाणा जैसे मैदानी राज्यों में राख के बड़े कणों के गिरने की संभावना बेहद कम है। केवल हल्के और सूक्ष्म कण हवा के साथ कुछ जगहों तक पहुंच सकते हैं, जिसका प्रभाव लोगों को मुश्किल से महसूस होगा।
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों गोरखपुर, बहराइच, लखीमपुर खीरी और हिमालयी क्षेत्रों पर सल्फर डाइऑक्साइड के बढ़े स्तर का हल्का प्रभाव देखने को मिल सकता है। क्योंकि ये इलाके पर्वतीय हवाओं और नमी वाले वातावरण से जुड़े होते हैं, गैस का जमाव यहां थोड़ी देर तक टिक सकता है।
हवाई यातायात पर क्या पड़ेगा असर?
ऊंचाई पर फैली राख हवाई यातायात के लिए बाधा बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ उड़ानों को अपेक्षाकृत ऊंचाई पर उड़ान भरने में कठिनाई हो सकती है, जिसके चलते मार्गों में बदलाव या थोड़ी देरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, व्यापक विमानन संकट जैसी स्थिति बनने की आशंका कम है।
स्वास्थ्य पर कितना खतरा?
वर्तमान में प्लम का अधिकतर हिस्सा ऊपरी वायुमंडल में मौजूद है। इसलिए दिल्ली-एनसीआर या मध्य भारत के बड़े शहरों में रहने वाले आम लोगों के लिए आंखों में जलन या सांस से जुड़ी परेशानी की आशंका नहीं है। फिर भी स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अस्थमा, सीओपीडी या सांस की पुरानी बीमारी से जूझ रहे लोग अनावश्यक बाहरी गतिविधियों से बचें और एयर-प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें खासकर वे लोग जो तराई और पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं।
कितने दिन रहेगा यह प्रभाव?
मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि यह स्थिति अगले कुछ दिनों तक बनी रह सकती है। हवाओं के रुख में बदलाव आने पर राख और गैस का घनत्व भी कम होता जाएगा। फिलहाल इसे किसी बड़े पर्यावरणीय या स्वास्थ्य संकट के रूप में नहीं देखा जा रहा, लेकिन विशेषज्ञ लगातार निगरानी बनाए हुए हैं।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि पृथ्वी के एक हिस्से में हुई प्राकृतिक गतिविधि हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों को भी प्रभावित कर सकती है। सही जानकारी और छोटी-छोटी सावधानियों के साथ इसे सुरक्षित रूप से संभाला जा सकता है।



